THE ANTHOLOGY OF THOUGHTS
सूरज जब भी ढलता है, तो पीछे छूट जाती हैं कुछ परछाइयाँ...
शोर की इस दुनिया में जब बस्तियाँ मौन हो जाती हैं, तो धड़कनें सुनाई देने लगती हैं।
लफ्ज़ जब खामोश हों, तब निग़ाहें सारे अफ़साने उगल देती हैं।
सत्य का गला घोंट कर बने सिंहासनों की उम्र बहुत छोटी होती है।
खुद से भागते हुए उस मोड़ पर आ खड़े हुए जहाँ आईने भी मुँह फेर लेते हैं।
वह पगदंडी जो खेतों के बीच से होकर जाती है, मानो किसी नस की तरह जीवन रस पहुँचाती हो।